Thursday, June 19, 2008

शुद्ध गणित (बातें गणित की... भाग II)

जैसा की पिछले पोस्ट में ये निष्कर्ष निकला था की गणित विज्ञान और कला दोनों में आता है... और शुद्ध गणित तो (PURE MATHEMATICS) गणित की आधारशिला है, तो आज बातें गणित में शुद्धता की.

शुद्ध गणित पुरी तरह से तर्क पर आधारित है. इसे अप्रायोगिक/अव्यवहारिक गणित भी कह सकते हैं... अर्थात ऐसा गणित जिसका कोई उपयोग ना हो... फिर ऐसा गणित है ही क्यों? जी हाँ थोड़ा अजीब है पर कई चीज़ें ऐसी हैं जिनका कोई उपयोग नहीं है... कविता का क्या उपयोग है? सत्य की खोज में भटकने का क्या उपयोग है?... दर्शन शास्त्र का क्या उपयोग है? वैसे ही शुद्ध गणित का भी कहीं-ना-कहीं दिमागी उपयोग है... कमाल की बात ये है की जो आज शुद्ध गणित है कल उपयोगी हो जाता है... फिर अजीब... एक बंद कमरे में बैठ कर ऐसे गणित को जन्म देना जिसका वास्तविक दुनिया से कोई लेना देना नहीं... और उसका इतना उपयोग होने लगे की उसके बिना कई काम ठप हो जाए... शायद इसीलिए गणित और सत्य की खोज एक जैसे होते हैं... सत्य है, सर्वव्यापी है तभी तो दशकों बाद ही सही... उपयोगी हो जाता है

इस उपयोगी हो जाने के उदहारण कहीं भी मिल जायेंगे जैसे वित्त (Finance), रसायन शास्त्र (Chemistry), चिकित्सा (Medical Science), और कूटलेखन (Cryptography) इत्यादि. वित्त में तो प्रायिकता (Probability Theory) से लेकर दुर्व्यवस्था सिद्धांत (Chaos Theory) तक हर प्रकार के शुद्ध गणित का इस्तेमाल होता है. गांठ-गणित (Knot Theory) की खोज करते समय किसने सोचा होगा की इसका इस्तेमाल डीएनए की संरचनाओं के अध्ययन में होगा ऐसे ही समूहसिद्धांत (Group Theory) का इस्तेमाल रसायन सस्त्र में अणुओं (Molecules) के अध्ययन में होने लगा... रोबोट (Robotics) और संगणक विज्ञान (Computer Science) ने लगता है कुछ शुद्ध रहने ही नहीं दिया सबका इस्तेमाल कर डाला... खैर शुद्ध से प्रायोगिक हो जाने की विस्तृत बात किसी और पोस्ट में...


शुद्ध गणित के अंतर्गत आने वाली गणित की मुख्य शाखाएं हैं: सांस्थिति (Topology), विश्लेषण (Analysis: Real, complex, functional etc), ज्यामिति (Geometry), अंक सिद्धांत (Number Theory), अमूर्त/अव्यावहरिक बीजगणित (Abstract Algebra) आदि.


अगर मोटे तौर पर देखें तो शुद्ध गणित पूरी तरह से तर्क पर आधारित होता है इसमें उपयोगिता का कोई स्थान नहीं... इस तरह के गणित का मुख्य रूप से विकास २०वी सदी में ही हुआ. हुआ तो पहले भी था पर नामाकरण और एक शाखा के रूप में प्रसिद्द २०वी सदी में ही हुआ. ऐसा गणित जाना जाता है अपनी खूबसूरती के लिए (Mathematical Beauty), कठिन साधना जैसा होने और अव्यवहारिक होने के लिए. ये बता पाना तो कठिन है कि इसमें होता क्या है... पर साधारणतया यह कुछ स्वयमसिद्ध धारणाओं/तदात्म्यों (Axioms) से चालु होता है और फिर उन धारणाओं का इस्तेमाल करते हुए अन्य प्रमेय (Theorems) और फिर जो जग जाहिर है ... उनको साबित करना (आपने भी खूब साबित किए होंगे!). साबित हो गया तो प्रमेय जब तक नहीं हुआ तब तक अनुभाग या अटकल (Conjecture). गहरी गणित की सोच और सिद्धांतों का विकास कई बार बस गणित पढ़ते हुए ही किया गया अर्थात बिना किसी वास्तविकता को सोचे (और फिर दिमाग ख़राब होता है पढने वाले का, लिखने वाला तो जो दिमाग में आया लिखता गया... कितने गणितज्ञों को मैंने उनकी सुंदर सोच पर गाली दिया है ये मैं ही जानता हूँ). एक उदहारण के लिए: बड़े अंको के गुणनखंड निकालने, तथा रूढ़ संख्याओं से सम्बंधित गणितज्ञों ने कई तरीके खोज निकाले थे और इसका कोई उपयोग नहीं था... पर बहुत समय के बाद इसका उपयोग कूट लेखन (Cryptology) में होने लगा. इसी प्रकार प्रक्षेपणीय ज्यामिति (Projective Geometry) का उपयोग औद्योगिक रोबोट (Industrial robots) को चलाने में किया जाने लगा. कुछ लोग कहते हैं की हर प्रयोग होने वाले गणित के पीछे एक शुद्ध गणित की शाखा का हाथ होता है... पर खोज होने के क्रम में ये पूरी तरह सच नहीं है... जैसे ज्यामिति का उपयोग प्रायोगिक गणित की तरह शुरू हुआ पर अब ये शाखा उच्चतर स्तर पर लगभग पुरी तरह से शुद्ध गणित हो गई है.

ऐसा गणित को आत्म साक्षात्कार जैसी यौगिक क्रिया से भी जोड़कर देखा जाता है... रामानुजन का नाम तो आपने सुना ही होगा वो अपने गणित के ज्ञान को भगवान् की देन समझते थे... रोज देवी की पूजा करने के बाद २ घंटे बैठ कर सूत्र लिखते ही चले जाते थे. उन्हें अपने हर समीकरण और सूत्र में प्रकृति और भगवान् की झलक दिखती थी. कवियों की कविता की तरह तुकबंदी ... और साबित करने में परम आनंद ... ये सब गणितज्ञों के लक्षण होते हैं... एक तुकबंदी का उदहारण आप बगल के फ्रैक्टल (Fractal) में देख सकते हैं. अगर इसमें कुछ नहीं दिखा तो एक बार यहाँ देख आयें.


गणित को अगर ठीक से देखा जाय तो यह सिर्फ़ सच ही नही वरन अलौकिक सुन्दरता के भी दर्शन कराता है-बरट्रांड रसेल


चलिए अब थोडी गणित की भाषा के बात करते हैं: शुद्ध गणित गणित की वो शाखा है जो पुरी तरह से और सिर्फ़ पूरी तरह से कुछ मान्यताओं पर आधारित होता है...
अगर 'ये और ये' 'किसी भी अवस्था' में सच हैं तो उस अवस्था में 'फलां-फलां वाक्य' सत्य होगा. (अगर कोई गणितग्य हो तो उसको इसी वाक्य में पेंटिंग की सुन्दरता दिख जाय ! )
यहाँ जो 'ये और ये' है वो सच होना जरूरी नहीं है... और 'किसी भी अवस्था' का वर्णन करना भी जरुरी नहीं है. अगर हमारी ये मूल धारणाएं 'कुछ भी हों' और किसी ख़ास चीज़ के बारे में न हो तो हम गणित की बात कर रहे हैं :-) इसलिए शुद्ध गणित वो है जिसमें हमें कभी पता नहीं होता की हम क्या कर रहे हैं ना ही ये कि जो कह रहे हैं वो सच है या नहीं !

तर्क का गणित में वही स्थान है जो वास्तुकला में ढांचा या संरचना का... कुछ गणितज्ञ प्रायोगिक गणित (Applied Mathematics) को हल्का और बेकार मानते हैं... जी एच हार्डी (रामानुजन के सहयोगी गणितज्ञ) के अनुसार प्रायोगिक गणित जहाँ भौतिक सच्चाई का गणितीय रूप है वहीं शुद्ध गणित भौतिक संसार से परे की सत्यता दर्शाता है, उनके अनुसार गणित वही है जो सौंदर्य का बोध कराता हो और इस हिसाब से प्रायोगिक गणित कुरूप(dull) है !

वर्ग गणित(Category Theory) इसीलिए बनाया गया ताकि गणित की विभिन्न शाखाओं में रिश्ते बनाए जा सके और एक एकीकृत गणित का विकास हो.. काफ़ी हद तक ये सफल भी हुआ पर अभी भी इसका निरंतर विकास जारी है.

"गणित की कोई ऐसी शाखा नहीं होती जिसका भविष्य में किसी वास्तविक दुनिया की प्रक्रिया में इस्तेमाल न हो भले ही वो गणित कितना भी अव्यवहारिक क्यों ना हो" - निकोलाई लोबाचेव्स्की


शायद अब आप समझ रहे होंगे की ऐसा गणित होता ही क्यों है !

शायद पोस्ट लम्बी हो रही है... पर जाते-जाते एक गणितीय विरोधाभास जिसे हजाम विरोधाभास (Barbar's Paradox) भी कहते है... ये रसेल बरट्रांड विरोधाभास (Russel Bertrand Paradox) का अपभ्रंस है (अपभ्रंस इसलिए की ये पूरी तरह गणितीय नहीं है)...


मान लीजिये कि एक गाँव में एक हजाम(नाई) है और वो उन्ही और केवल उन्ही लोगो की हजामत बनाता है जो ख़ुद अपनी हजामत नहीं बनाते. अब बताइए इस वाक्य में कुछ समस्या है क्या?

बता ही देता हूँ क्योंकि पहले ही लोग बोल चुके हैं की इस श्रंखला में सवाल नहीं होने चाहिए !

- अब समस्या ये है की नाई अगर ख़ुद की हजामत बनाता है तो नियम के हिसाब से ख़ुद की हजामत नहीं बना सकता क्योंकि वो केवल उन्ही की हजामत बना सकता है जो ख़ुद अपनी नहीं बनाते !
- और अगर ख़ुद की हजामत नहीं बनाता तो नियम के हिसाब से उसे ख़ुद की हजामत बनानी चाहिए !

हा हा ! है ना मजेदार (कहीं ये मत कह दीजियेगा कि हद वेवकूफ आदमी है... इसमें मज़ा आने वाली क्या बात है !)

चलिए हजाम भाई की समस्या में रूचि हो तो यहाँ और यहाँ जानिए. बरट्रांड रसेल विरोधाभास बहुत प्रसिद्द विरोधाभास है... चलिए वादे के हिसाब से गणितीय पोस्ट नहीं होगी इसलिए कोई यहाँ प्रूफ़ नहीं.

आज की पोस्ट लिखने में बहुत मज़ा आया सबसे ज्यादा मज़ा आया गणित की शाखाओं के नाम हिन्दी में सोचने में... अगर किसी शाखा का और अच्छा नाम आपके दिमाग में आ रहा हो तो सुझाना न भूलें.

अगले पोस्ट में प्रायोगिक गणित (Applied Mathematics) के बारे में... और फिर उससे अगली पोस्टों में... इतनी बातें दिमाग में घूम रही हैं की इस श्रृंखला का अंत नहीं दीखता.... थोड़ा समयाभाव है पर सप्ताह में एक पोस्ट ठेलने की कोशिश रहेगी... वैसे इससे ज्यादा गणित पढ़ना भी नहीं चाहिए :-)

आज हिन्दी में सोचे/ढूंढे गए नामो की एक झलक:

PURE MATHEMATICS शुद्ध गणित
Cryptography कूटलेखन
Chaos Theory दुर्व्यवस्था सिद्धांत
Knot Theory गांठ-गणित
Group Theory समूह सिद्धांत
Topology सांस्थिति
Analysis (Real, complex, functional etc) गणितीय विश्लेषण
Abstract Algebra अमूर्त/अव्यावहरिक बीजगणित
Axioms स्वयमसिद्ध धारणा/तदात्म्य
Conjecture अनुभाग या अटकल
Theorems प्रमेय
Projective Geometry प्रक्षेपणीय ज्यामिति
Category Theory वर्ग गणित


~Abhishek Ojha~

14 comments:

Udan Tashtari said...

रेस्पेक्टेड सर

सबजेक्ट: रिक्वेस्ट फॉर सिक लीव

आई एम सफरिंग फ्राम फीवर सिन्स लास्ट नाईट. काईन्डली ग्रांट मी लीव फॉर वन डे.

थेन्किंग यू

योर्स फेथफुल्ली
समीर लाल

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ये अर्जी लिखना सीखी थी स्कूल में. जब कठिन गणित की क्लास रहती थी, तो जमा करा देते थे. आज बहुत साल अर्जी लिखना सीखना फिर से काम आ गया.

कहते है न कि ज्ञान कहीं न कहीं काम आ ही जाता है. कभी बेकार नहीं जाता. आज सबित हो गया.

वैसे रात में हिम्मत जुटा कर, नहा कर, पूजा करके फिर से पढ़ूँगा. :)

Gyandutt Pandey said...

अरे ग्रेट! यह पोस्ट तो पुराने प्रेम को उभार गयी। एक जमाने में गणित पर ज्यादा मेहरबान थे हम - इस चक्कर में भी कि शायद हमारी प्रतिभा से गणित के प्रोफेसर की लड़की हमसे इम्प्रेस हो जाये।
पर होता वही है जो राम रचि राखा!

दिनेशराय द्विवेदी said...

भाई, वाह! ये चलता रहा तो मजा वाकई आ जायेगा। हम लीलावती से कुछ तो आगे बढ़ पाएँगे।

Neeraj Rohilla said...

बेहतरीन पोस्ट,

इतने साल इंजीनियरिंग घोटने और शोध करने के दौरान गलतफ़हमी हो गयी थी कि गणित खूब बढिया आता है । सो इसी गलतफ़हमी में गणित विभाग में एक एडवांस्ड कोर्स "Partial Differential Equations" में जा के बैठ गये । पूरा हफ़्ता हो गया क्लास करते करते और बोर्ड पर एक भी Partial Differential Equations (wave equation, heat equation) टाईप की चीज दिखाई न दी । सब कुछ nth dimensional space में चल रहा था । अगले हफ़्ते हमने हाथ जोड लिये :-)

इसीलिये कसम खाई है कि गणित के कोर्स केवल इंजीनियरिंग विभाग में करूंगा अथवा Applied Mathematics विभाग में :-)

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

सिर मेरे पेट में दर्द हो रहा है.. तबीयत ठीक नही लग रही.. आधी छुट्टी चाहिए..

प्रभाकर पाण्डेय said...

बड़े भाई, नमस्कार। बेहतरीन लेख के लिए सादर आभार।

अभय तिवारी said...

भाईसाब साष्टांग प्रणाम करता हूँ..ज़रा और जम कर लिखिए..

Ajit Burad said...

वैसे गणित से तो हमे भी काफी लगाव रहा है. बाकि आपके साथ काम करके और सीख ही रहे हे :)
अच्छा लिखा है, गणित जैसे विषय पर ब्लॉग पोस्ट लिखना काफी साहस का काम है.

रंजू ranju said...

यह बहुत उच्च कोटि की बात आप समझा रहे हैं हमारी निम्न बुद्धि में कुछ समझ नही आया इस विषय से तो मुझे सबसे ज्यादा डर लगता है और डराना मना है .मैं भी समीर जी और कुश की तरह जब जब यह क्लास है बीमार हूँ :)

जुड़िये गँठजोड़ मित्र समुदाय से! (gathjod.com) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

वैसे "मैं हमेशा झूठ बोलता हूँ।"

(तो जब मै बोला कि "मैं हमेशा झूठ बोलता हूँ।" तो वह भी झूठ है? मतलब सच है।)

masijeevi said...

अनूपजी का शुक्रिया उन्‍होंने आपके चिट्ठे की ओर भेजकर प्रसन्‍न कर दिया है। अभी बैठकर सारा चिट्ठा बॉंचा। आपकी शैली बहुत ही रोचक है। मेरा विषय तो भाषा है पर जैसा मैंने पहले लिखा था मुझे तो भाषा खद ही एक फ्रैक्‍टल लगती है। मुझे याद है कि अपने चिट्ठे पर मैनें कुछ फ्रैक्‍टल भी पोस्‍ट किए थे....वे यहॉं, यहॉं, यहॉं और यहॉं हैं। आप कृपया लिखते रहें, जितना हो सके। आपसे खूब बात हुआ करेगी ऐसा मुझे लगता है।

अशोक पाण्डेय said...

अरे वाह, आप तो गणित का सौन्‍दर्यबोध करा रहे हैं। अब तक तो साहित्‍य का सौन्‍दर्यबोध करानेवाले ही मिले थे।
भेजे में भले कुछ न अटे, कुछ-कुछ सुंदर जरूर लग रहा है, जैसे कि हजाम विरोधाभास।
अब तो इस क्‍लास में हाजिरी लगानी ही पड़ेगी।

neeraj badhwar said...

abhishek ganit se merea rishta vaisa hi reha hai jaisa israel ka palestine se. phir bhi aapka blog padh kar laga ki badhiya master mila hota to shayad ganit se yudh-viram ho sakta tha!

हरिमोहन सिंह said...

अभी तो ठी क है वरना मेरे पेट में सिरदर्द होने लगता है