Thursday, July 9, 2009

गणितीय नेकलेस

पहले तो सोचा कि शीर्षक रखा जाय 'गणितीय हार'। लेकिन फिर लगा की इसका मतलब कहीं 'गणित से हुई हार' या 'गणित की हार' ना निकल जाए। वैसे तो युद्ध में गणित का इस्तेमाल खूब हुआ लेकिन असल में हार-जीत में कितना प्रभावी हुआ इसका ठीक-ठीक हिसाब किसी ने नहीं लगाया। युद्ध में किस तरह इस्तेमाल होता था वो फिर कभी। Fratal_necklace पहले तो आप ये 'हार' देखिये। ये फ्रैक्टल से प्रेरित होकर बनाया गया है। और इसका नाम रखा गया है 'जूलिया नेकलेस'।

फ्रेंच गणितज्ञ गेस्टन जूलिया* के नाम पर। उनके नाम पर गणित में जूलिया समुच्चय (जूलिया सेट) होते हैं जिनका फ्रैक्टल के सिद्धांतों से गहरा नाता है। बात तो टोपोलोजी की करनी थी लेकिन इस हार ने मन मोह लिया तो आज यही सही। यह नेकलेस फ्रैक्टल से प्रेरित है, दिवाली पर मैंने कुछ फ्रैक्टल पोस्ट किए थे 'गणितीय रंगोली' के नाम से। कुछ फ्रैक्टल के चित्र आप वहां देख सकते हैं। फ्रैक्टल का एक महत्वपूर्ण गुण रिपीटेटिव पैटर्न होता है। अर्थात फ्रैक्टल एक छोटा से छोटा हिस्सा भी पूरे हिस्से का एक छोटा रूप होता है।

बुशेरोन कंपनी के लिए डिजाइनर मार्क न्यूसन द्वारा डिजाईन किये गए २००० हीरों और और नीलम जड़े इस हार को बनाने में १५०० घंटे लगे। संभवतः ये बुशेरोन कंपनी द्बारा बनाया गया अब तक का सबसे महंगा नेकलेस है।

~Abhishek Ojha~

*जूलिया पुरूष गणितज्ञ थे।

साभार यहाँ और यहाँ से।

Tuesday, June 30, 2009

टोपोलोजी और फक्का !

पहले परिचय फक्का से. वाक्य प्रयोग के हिसाब से फक्का या तो खाने की चीज होती है या लगने वाली. पर वास्तव में कम से कम खाने की तो नहीं होती ! हमारे कॉलेज में ग्रेडिंग होती है और 'ए' से 'एफ' तक (‘इ’ छोड़कर) ग्रेड मिलते हैं. कॉलेज शब्दावली में इन्हें क्रमशः इक्का, बिक्का, सिक्का, डिक्का और फक्का कहा जाता है. अब तो आप समझ ही गए होंगे फक्का मतलब न्यूनतम ग्रेड अर्थात फेल ! तो ये शब्द खूब इस्तेमाल होता था. वैसे फक्का शब्द का मूल शब्द 'एफ' ग्रेड है या ‘चार अक्षरीय एफ शब्द’ कई चर्चाओं के बाद भी ये अब तक अनजान ही है. विद्वानों में इस पर मतभेद है और जब तक कोई भाषाविज्ञानी इस पर काम नहीं करता हम ये मानते हैं कि फिलहाल दोनों ही संभव है. :)

अब बात टोपोलोजी की. टोपोलोजी गणित की एक मुख्य शाखा है. वैसे नाम सुनकर तो यही लगता है कि कुछ ऐसा गणित होता होगा जिसमें टोपने की कला सिखाई जाती होगी ! टोपने के फोर्मुले ! (अब टोपना क्या होता है ये नहीं पता तो किसी भी कनपुरिये से पूछ लीजिये. मुझे पूरा यकीन है कि से शब्द कैम्पस के बाहर से आया होगा). पर जब पता चला कि टोपोलोजी निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा फक्के लगाने (खिलाने) वाला कोर्स होता है तो लगा कि टोपोलोजी शायद इसलिए कहते होंगे क्योंकि इसमें टोप के भी कोई पास नहीं हो पाता. अक्सर परीक्षा के पहले ये बात उठती… ‘टोपोगे तो किसका?’ एक आध जिनको समझ में आता वो टोपा-टापी से दूर ही रहने वाले विजातीय लोग हुआ करते थे. और हर बार दो तिहाई क्लास फक्का खा जाती. तो गणित नहीं हॉरर हुआ करता था. और भय फर्स्ट इयर से ही चालु हो जाता. अब मध्यकालीन भारत में नादिरशाह आया होगा... तब फ़ोन तो नहीं था फिर भी २-४ गाँव तक आतंक की खबर तो पहुचती ही होगी. वैसे ही भरपूर आतंक हुआ करता टोपोलोजी का भी.

कुल मिला के टोपोलोजी का आतंक और फक्को से बड़ा गहरा नाता रहा है. वैसे अजीब विषय है जिनके नंबर आते हैं उनके पूरे आते हैं और बाकी खाता ही नहीं खोल पाते खोलते भी हैं तो ५-१० से आगे नहीं बढ़ पाते. बीच के नंबर लाने वाले बिरले ही होते हैं. पूरी तरह से से अब्सट्रैक्ट गणित होता है जिनको समझ में आये तो एकदम ही. ना आये तो फिर... !

वैसे एक बार इलाहबाद में स्थित एचआरआई में एक कांफ्रेंस में एक हमउम्र विद्यार्थी से मुलाकात हुई तो उसने बताया 'इस साल तो टोपोलोजी जैसे कुछ स्कोरिंग पेपर थे तो अच्छे नंबर आ गए !' हम तो उसे बड़ी इज्जत कि नजरों से देखे. क्या तेज लड़का है ! फिर उसने बताया '२०-२५ सवाल रट लेने होते हैं और हर साल वही तो आता है पेपर में !'. इससे हमारी उच्च शिक्षा के स्तर का पता चलता है, कितनी मददगार है न !. खैर हमें तो बहुत दुःख हुआ... काश ! हम भी वैसे पास हुए होते. कहाँ हमारे क्लास के रणबांकुरे चौथी बार में पास हुए थे. खैर आपको बता देता हूँ भले किसी लड़की से उसकी उम्र १० बार पूछियेगा किसी आईआईटी कानपुर/दिल्ली में पढ़े इंसान से टोपोलोजी का ग्रेड और कितनी बार में पास हुआ ये मत पूछियेगा. मैं बस इतना बताये दे रहा हूँ कि एक बार में ही पास हो गया था अब ग्रेड तो नहिये बताऊंगा चाहे कुछ भी हो जाए :)

हाँ तो अब मन किया... थोडा आपको बता दिया जाय कि ये चीज क्या होती है ! गणित की इस शाखा और इससे जुड़े कुछ गणितज्ञों के बारे में अगली कुछ कड़ियों में. वैसे एक बात है अगर कोई अच्छा पढाने वाला हो और टोपोलोजी को फील करने वाला इंसान तो फिर ये आनंद की प्राप्ति करने वाला होता है. वैसे मुझे कभी फीलिंग नहीं आ पायी पर कुछ बातें बड़ी रोचक लगी और इससे जुड़े कुछ लोग तो... !

घबराइये नहीं रोचक कहानिया, किस्से और इतिहास ही होगा और आप सब को इक्का तो मिलेगा ही.

~Abhishek Ojha~

Tuesday, June 23, 2009

ब्लॉग्गिंग के खतरे: भाग ५

पिछली पोस्ट से जारी...

कुछ ब्लॉग व्यवसायिक होते हैं, जैसे कम्पनियों के ब्लॉग. उनके लिए अक्सर ये ब्लॉग समस्या कड़ी कर देते हैं. कानूनी अडचनों के अलावा अक्सर आन्तरिक खबर और व्यवसाय की गोपनीयता/रणनीति सार्वजनिक हो जाती है. अगर ऐसी ब्लॉग्गिंग आपका पेशा है तो भाई ये सब तो आप को पता ही होगा ! अगर नहीं है तो हम आपको फोकट में क्यों बताएं :) यहाँ तो हम जैसे टाइम पास ब्लोगरों के लिए बकबक की जा रही है.

तो हम जैसे लोग आप इस बात का ध्यान रखिये... अगर बॉस की बुराई करनी हो, उससे कुछ विवाद चल रहा हो, कुछ आपसी मतभेद या शिकायतें हैं तो उन्हें ब्लॉग से दूर ही रखो तो बेहतर है. नौकरी का खतरा तो वैसे पिछली पोस्ट में आ ही गया था. अगर ज्यादा व्यक्तिगत बातें तलाक करवा दें तो आर्श्चय नहीं ! अरे जब खर्राटे लेने तक से तलाक हो सकता है तो ब्लॉग्गिंग की माया तो… ! हाँ एक बात फिर से कहना चाहूँगा. अगर आपको लगता है कि आपका ब्लॉग बहुत कम लोग पढ़ते हैं तो ये आपकी गलतफहमी है. भले ही बहुत कम लोग पढ़ते हैं पर आप जिसके बारे में लिख रहे हैं उसे तो पता चल ही जाएगा. भले ही वो बुरकीना फासो में रहता हो और उसने हिंदी का नाम भी नहीं सुना हो !

टिपण्णीयों और ब्लॉग पर दिखने वाले विज्ञापनों में अगर अश्लील सामग्री दिखने लगे तो... ? कुछ दिनों पहले रवि रतलामीजी ने इस पर एक पोस्ट लिखा था. और कल ही एक प्रतिष्ठित ब्लोगर के ब्लॉग पर लडकियां उपलब्ध करवाई जा रही थी. तो अब हम क्या कहें !  इसके साथ अगर कोई (स्पैम) टिपण्णी में वायरस या ऐसा ही अश्लील लिंक हो तो आप वहां तक चले ही जायेंगे. अगर वायरस जैसा कुछ हुआ तो क्या-क्या हो सकता है आप जानते ही हैं.

एक रोचक और खतरनाक खतरा है. मुंबई हमलों में खबर आई कि आतंकवादी भीतर बैठे ट्विट्टर पर अपडेट देख रहे हैं. वैसे अपने सजग और बुद्धिमान (?) टेलिविज़न चैनलों के होते हुए उन्हें ये करने की जरुरत पड़ी हो ऐसा लगता तो नहीं. फिर भी ये खतरा तो है ही. और हड़बड़ी में लोकप्रिय होने के लिए लोग धकाधक सनसनी खेज खबरें तो ठेलते ही हैं ! खासकर उन्हें जिन्हें ऐसी खबरें मिलती हैं उन्हें सावधानी तो बरतनी ही चाहिए.

इसके अलावा अगर आपने कुछ विवादस्पद [थोडा ज्यादा सच :)] लिख दिया और दंगे-वंगे हो जाएँ तो बड़ी बात नहीं होगी. इसीलिए शायद कहा जाता है सच और सच के सिवाय कुछ नहीं. ज्यादा और कम सच कुछ नहीं होता या तो सच होता है या झूठ. सच और झूठ बाइनरी है जी… बस ० या १ होता है बीच का नहीं. तो सच से ज्यादा या कम लिखने पर दंगे हो गए तो फिर अब इससे बड़ा खतरा क्या होगा? आप अपने को सच भी साबित नहीं कर पायेंगे जी !

इस पूरी श्रृंखला में छोटे-बड़े जो भी खतरे आये इनमे से ऐसा कोई नहीं जिसे लेकर ब्लॉग्गिंग बंद कर दी जाए. सभी से सावधानी बरतने का संकेत जरूर मिलता है.

और फिर अंत में गोल-गोल घुमने के बाद फिर वही बात जहाँ से चालु हुई थी. ये कोई खतरों की एक्सटेंसिव सूची नहीं है. और असली खतरें तो वो होते हैं जो कोई सोच/देख/गिना नहीं सकता. असली अप्रत्याशित खतरे तो ऐसे होते हैं: 'न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव'. नसीम तालेब के ब्लैक स्वान की तरह जब तक कोई काला हंस ना दिख जाए सब यही मान के चलते हैं कि हंस तो बस श्वेत ही होता है ! वैसे ही जब तक पहली बार कोई अप्रत्याशित घटना नहीं हो जाती हमें सब सुरक्षित ही लगता है. वो खतरा ही क्या जिसके बारे में पहले से जानकारी (भ्रम!) हो.

(समाप्त)

~Abhishek Ojha~

--

इन खतरों के बीच में गणित खो गया था. गणित की वापसी अगली पोस्ट से...